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कृष्‍णशंकर [entries|archive|friends|userinfo]
कृष्‍णशंकर

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विनय दुबे [Sep. 6th, 2008|08:11 am]


गत 04 सितम्बर 2007 को विनय दुबे हम सबमें से उठकर अनन्त में विलीन हो गए । यह एक वर्ष का अन्तराल इस तरह रहा कि पता ही नहीं चला कि वे वास्तव में हम से विलग हुए हो। आभास तो तब हुआ जब उनकी प्रथम पुण्यतिथि हिन्दी साहित्य सम्मेलन में मनाई गई । भोपाल के वरिष्ठ सृजनधर्मियों ने उन्हें स्मरण किया और उनकी याद ताजा की । प्रस्तुत है उनकी एक कविता....

यह नहीं है मेरा चेहरा

मेरा नाक नक्श

लहरिल प्रतिबिम्बों में

आकाश व्यापी

सड़कों गलियों

घूमता फिरता आतुर

नाकाम

बिछुड़ा बिछुड़ा

भीड़ भाड़ में

प्रातःकाल

बीच सूरज की किरणों के

एक पूरा मैदान जहां

घिरा बच्चों से

नदी किनारे

बैठा लिए तुम्हारी याद

संग साथ की तुम्हारे

यह नहीं है मेरा चेहरा

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हिन्दी वेबसाइट [Sep. 5th, 2008|09:21 pm]
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http://raviratlami.googlepages.com/Remington-krutidev-online-Hindi-Easy-

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0 जगदीश व्योम 0 मुक्तक सागर  कविता कोश 0 हिन्दी गगन

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0हिन्दी की १०० सर्वश्रेष्ठ प्रेम कविताएँ  

हिन्दी में खोज के लिए 0 हिन्दी प्रायोजना कार्य 0 दुष्यन्त कुमार

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देर अबेर सही [Aug. 10th, 2008|09:55 pm]

देर अबेर सही
जो मैंने सुनी
शायद तुमने कही
अनकही।
निरर्थक नहीं होते शब्द
निर्झर से बहते
बातों ही बातों के सोते ।
मन की कहीन
न रह जाए
कहो तो सही
आज,कल,परसों
कानों में घुलते
वो शब्द मधुरिम
सहो तो सही ।
-.कृष्णशंकर सोनाने

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(no subject) [Jun. 6th, 2008|09:19 am]

कृष्‍णशंकर का कबाड़खाना

                   कृष्‍णशंकर का कबाड़खाना आपके लिए प्रस्‍तुत है । साहित्‍य में मैंने अब तक जो भी रचनाएं लिखी है,पुरोधा साहित्‍यकारों की नजर में वह कबाडे़ से कम नहीं है ।  यदि कबाडा़ नहीं होता है तो अवश्‍य ही कहीं न कहीं उनकी नजरों में उनमें कुछ न कुछ दिखाई जरूर देता । जैसे उनके गुट का होता तो अवश्‍य ही मेरा सृजन कबाडा़ नहीं होता किन्‍तु मैं उनके गुट का नहीं हूँ,इसलिए मेरा सारा का सारा सृजन कबाड़खाना ही तो है । भई ,कबाडी़ अपने पास कबाडा़ ही तो रखता है न , तो ठीक है मैंने भी अपने पास अपनी रची रचनाओं का कबाडा़ जुटा कर रखा है ।--कृष्‍णशंकर

शायद आपको ज्ञात होगा, अच्‍छों अच्‍छों को कभी न कभी कबाड़खाना जाना ही पड़ता है । इसलिए मैंने सोचा,क्‍यों न मैं अपने कबाडे़ को संभालकर रखूँ । हो सकता है कोई न कोई जागरूक साहित्‍यकार अवश्‍य होगा जिन्‍हें मेरे कबाडे़ में कुछ तो अच्‍छा लगेगा । मैं समझूँगा, मेरा कबाडा़ जुटाना सार्थक हो गया । अब यह देखना है, मेरा कबाडा़ देखने के लिए किसे फुरसत मिलती है------- चलो प्रतीक्षा करते है

वैसे आजकल पुराधाओं को अपनी पसन्‍द के रचनाकारों की रचनाएं ही बडी़ अच्‍छी लगती है । बाकी रचनाकारों की रचनाओं को कबाडा़ कहने का  प्रचलन खूब चला है । किसी ने तो तुलसीदास और महावेदी वर्मा के सृजन को ही कचरा कह डाला । जब ऐसे ऐसे साहित्‍यकारों की रचनाओं को कचरा कह दिया तो हमारी क्‍या औकात । इसलिए हम हाजिर है आपके लिए अपना कबाडा़ लेखन लिए;;;;;;;;

    मेरे कबाड़ाखाने में ढ़ेर सारा कबाड़ा इकत्रित हो गया है । यह एक तरह का कबाड़ा नहीं है,भिन्‍न भिन्‍न तरह का है ।  इस कबाड़े में कविता,कहानी,उपन्‍यास,गजलें,गीत,संस्‍मरण,आत्‍मकथा और न जाने क्‍या क्‍या एकत्र है। लेकिन ये सारे बिकाऊ नहीं है, न ही कोई खरीद सकता है । कोई खरीदना भी चाहे तो मैं ना बेचूँ । मुझे अपना कबाड़खाना सजाना अच्‍छा लगता है  और लगता है,इस कबाड़खाने को बार बार निहारूँ,पुचकारूँ और देख देख कर खुश हो लूँ ।

    वैसे आप भी चाहे तो इस कबाड़खाने का खंगालकर आनन्‍द ले सकते हैं । कुछ खट्टे,कुछ मीठ,कुछ नमकीन तो कुछ चरपिरे है इनमें । आप चाहे तो कोई एक स्‍वाद के मजे ले सकते हैं या चाहे तो सभी तरह के स्‍वाद ले । मैं तो कहूँ कि----

       मेरा कबाड़ा है ।

            मेरा नगाड़ा है ।

          मेरा लबाड़ा है ।।
http://shankarsonane.blogspot.com
http://shankarsonane.wordpress.com
http://shankarsonane.mywebdunia.com 
  

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मेरे नीजि ब्‍लाक [Aug. 20th, 2007|10:22 pm]

 मेरे नीजि ब्‍लाक 
                    Please visit..................
                                      www.krishnshanker.blogspot.com
                                      
      www.drshankarsonane.wordpress.com

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(no subject) [Dec. 23rd, 2006|03:15 am]


अनुभवातीत

विभो,तुम हो अनुभवातीत

हृदय पटल में तेरा वास
तू ही  धडकन के आसपास
सरस्‍वती की कल्‍पना से भी है तू कल्‍पनातीत
विभो,तुम हो अनुभवातीत

तू   ही ब्रह्‌म एक रसानन्‍द
न कोई दूजा परमानन्‍द
सोऽहं के भाव-योग में तू ही तो है तुरीयातीत
विभो,तुम हो अनुभवातीत

तू ही अनादि अनन्‍त है
तेरा न कोई अन्‍त है
काल की गणना से भी है तू कालातीत
विभो,तुम हो अनुभवातीत

किस भाषा से बाँधू तुझको
किन शब्‍दों में पिरोऊँ तुझको
वेदों और पुरानों की ऋचाओं से भी अक्षराती
विभो,तुम हो अनुभवातीत

दृश्‍य क्‍या है अदृश्‍य क्‍या है
क्षितिज का विमरश क्‍या है
दृष्‍टि का धोका है या तुम हो मायातीत
विभो,तुम हो अनुभवातीत
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