कृष्णशंकर का कबाड़खाना आपके लिए प्रस्तुत है । साहित्य में मैंने अब तक जो भी रचनाएं लिखी है,पुरोधा साहित्यकारों की नजर में वह कबाडे़ से कम नहीं है । यदि कबाडा़ नहीं होता है तो अवश्य ही कहीं न कहीं उनकी नजरों में उनमें कुछ न कुछ दिखाई जरूर देता । जैसे उनके गुट का होता तो अवश्य ही मेरा सृजन कबाडा़ नहीं होता किन्तु मैं उनके गुट का नहीं हूँ,इसलिए मेरा सारा का सारा सृजन कबाड़खाना ही तो है । भई ,कबाडी़ अपने पास कबाडा़ ही तो रखता है न , तो ठीक है मैंने भी अपने पास अपनी रची रचनाओं का कबाडा़ जुटा कर रखा है ।--कृष्णशंकर
शायद आपको ज्ञात होगा, अच्छों अच्छों को कभी न कभी कबाड़खाना जाना ही पड़ता है । इसलिए मैंने सोचा,क्यों न मैं अपने कबाडे़ को संभालकर रखूँ । हो सकता है कोई न कोई जागरूक साहित्यकार अवश्य होगा जिन्हें मेरे कबाडे़ में कुछ तो अच्छा लगेगा । मैं समझूँगा, मेरा कबाडा़ जुटाना सार्थक हो गया । अब यह देखना है, मेरा कबाडा़ देखने के लिए किसे फुरसत मिलती है------- चलो प्रतीक्षा करते है
वैसे आजकल पुराधाओं को अपनी पसन्द के रचनाकारों की रचनाएं ही बडी़ अच्छी लगती है । बाकी रचनाकारों की रचनाओं को कबाडा़ कहने का प्रचलन खूब चला है । किसी ने तो तुलसीदास और महावेदी वर्मा के सृजन को ही कचरा कह डाला । जब ऐसे ऐसे साहित्यकारों की रचनाओं को कचरा कह दिया तो हमारी क्या औकात । इसलिए हम हाजिर है आपके लिए अपना कबाडा़ लेखन लिए;;;;;;;;
मेरे कबाड़ाखाने में ढ़ेर सारा कबाड़ा इकत्रित हो गया है । यह एक तरह का कबाड़ा नहीं है,भिन्न भिन्न तरह का है । इस कबाड़े में कविता,कहानी,उपन्यास,गजलें,गीत,संस्मरण,आत्मकथा और न जाने क्या क्या एकत्र है। लेकिन ये सारे बिकाऊ नहीं है, न ही कोई खरीद सकता है । कोई खरीदना भी चाहे तो मैं ना बेचूँ । मुझे अपना कबाड़खाना सजाना अच्छा लगता है और लगता है,इस कबाड़खाने को बार बार निहारूँ,पुचकारूँ और देख देख कर खुश हो लूँ ।
वैसे आप भी चाहे तो इस कबाड़खाने का खंगालकर आनन्द ले सकते हैं । कुछ खट्टे,कुछ मीठ,कुछ नमकीन तो कुछ चरपिरे है इनमें । आप चाहे तो कोई एक स्वाद के मजे ले सकते हैं या चाहे तो सभी तरह के स्वाद ले । मैं तो कहूँ कि----
‘ मेरा कबाड़ा है ।
मेरा नगाड़ा है ।
मेरा लबाड़ा है ।।
http://shankarsonane.blogspot.com
http://shankarsonane.wordpress.com
http://shankarsonane.mywebdunia.com